।। मांस मत खाओ ।।

।। मांस मत खाओ ।।


अंकुरज भखे सो मानवा, रज बीज भखे सो स्वान ।
जीव हते सो काल है सदा नरक परमान ।।
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अब वेद शास्त्रों से सुनिये वे भी संवेद के समानही मांस मदिरा आदि अभक्ष्यका ग्रहण तथा किसीके दुःख देनेको महापाप बतलाते है ।
अथर्व---"अस्तिनु तस्माद् ओ जीयो यद् विहव्ये न
ईजिरे ।" जीवहत्याके कर्म गंदे हैं उनका उत्तम फल नही,वोही भगवान् की उपासना सर्वश्रेष्ठ है जिसमें जीवहत्या नहीं होती । ""मग्धादेवा उत शुना यजन्त उत गो रँगे:पुरुधा यजन्त"" वे एक तरहके पागल है जो कुत्ते जैसे निकृष्ट प्राणियोंतकके मांसको भी नही छोड़ते तथा गऊओके अंगको काट काटकर खाने खिलानेसे
परमात्माको प्रसन्न हुआ मानते है । वो मार्ग उनके कल्याण का नहीं है , किंतु नरक देनेवाला है । कोई -कोई यह कहते हैं कि, यज्ञ आदिमें की गई हिंसा हत्या नहीं है , बाकी सब हत्याएं है ।यदि विचार करके देखा जाय तो इसमें भी सार नहीं है - क्योंकि, अथर्व वेदमें लिखा हुआ है कि, """इष्टापूर्तस्य व्यभजन्त यमस्य अभी षोडशं सभापद:”"
यदि यज्ञ आदिमें भी हत्या करोगे तो तुम्हें पुण्य यज्ञका मिलनेवाला था उसमें सोलहवें हिस्सेका पाप भी भोगना पड़ेगा । स्वर्गके अमृत कुंडोमें स्नान करनेवालोंको अपनी जीव हत्याके पापोंके कारण भयंकर आगकी तपिस भी सहनी पड़ेगी इससे यह बात सिद्ध होजाती है कि, वेद हत्यामें कभी भी पुण्य नही मानता, यज्ञके नामकी हत्यामे भी पाप होता है पुण्य नही होता ।
ऋग्वेद-- स्तोमास स्त्वा विचारिणि, प्रतिष्टोभन्त्यक्तुभि: । प्रयावाजं न हेषन्तं पेरूमस्यस्यर्जुनि ।।
अर्थ-- जो कोई मांस खाता है वह नरकी होता है सर्वदा दु:खमें पड़ा रहता है उसका देखना भी महापाप है इस तरहके पापियोंके दर्शन करना ही महापाप है बहुत अच्छा हो कि ,ऐसे पापी नारकीय स्थानोंमें ही पड़ा रहें ।
वेदमें एक स्थानमें लिखा है कि, घास चौपायों के लिये बनाया गया है ,और अनाज मनुष्योंके लिये है जैसे स्त्री पुरुषके लिये वैसेही पशु पशुके लिये है । मानुषी स्त्री पशुके लिये नहीं है ,उसी प्रकार मांस मनुष्यों के लिये नही है ।
हिन्दू धर्मशास्त्रों मे एकमत से सभी जीवों को ईश्वर का अंश माना है व अहिंसा, दया, प्रेम, क्षमा आदि गुणों को अत्यंत महत्व दिया , मांसाहार को बिल्कुल त्याज्य, दोषपूर्ण, आयु क्षीण करने वाला व पाप योनियों में ले जाने वाला कहा है । महाभारत के अनुशासन पर्व में भीष्म पितामह ने मांस खाने वाले, मांस का व्यापार करने वाले व मांस के लिये जीव हत्या करने वाले तीनों को दोषी बताया है । उन्होने कहा हैं कि जो दूसरे के मांस से अपना मांस बढ़ाना चाहता है वह जहा कहीं भी जन्म लेता है चैन से नहीं रह पाता । जो अन्य प्राणियों का मांस खाते है वे दूसरे जन्म में उन्हीं प्राणियों द्वारा भक्षण किये जाते है । जिस प्राणी का वध किया जाता है वह यही कहता है
"मांस भक्षयते यस्माद भक्षयिष्ये तमप्यहमू "अर्थात् आज वह मुझे खाता है तो कभी मैं उसे खाऊँगा ।
श्रीमद् भगवत गीता में भोजन की तीन श्रेणियाँ बताई गई है ।
(1) सात्त्विक भोजन -जैसे फल, सब्जी, अनाज, दालें, मेवे, दूध, मक्सन इत्यादि जो अग्यु, बुद्धि बल बढ़ाते है व सुख, शांति, दयाभाव, अहिंसा भाव व एकरसता प्रदान करते है व हर प्रकार की अशुद्धियों से शरीर, दिल व मस्तिष्क को बचाते हैं
(2) राजसिक भोजन - अति गर्म, तीखे, कड़वे, खट्टे, मिर्च मसाले आदि जलन उत्पन्न करने वाले, रूखे पदार्थ शामिल है । इस प्रकार का भोजन उत्तेजक होता है व दु :ख, रोग व चिन्ता देने वाला है ।
(3) तामसिक भोजन -जैसे बासी, रसहीन, अर्ध पके,दुर्गन्ध वाले, सड़े अपवित्र नशीले पदार्थ मांस इत्यादि जो इन्सान को कुसंस्कारों की ओर ले जाने वाले बुद्धि भ्रष्ट करने वाले, रोगों व आलस्य इत्यादि दुर्गुण देने वाले होते हैं ।
वैदिक मत प्रारम्भ से ही अहिंसक और शाकाहारी रहा है, यह देखिए-
य आमं मांसमदन्ति पौरूषेयं च ये क्रवि: !
गर्भान खादन्ति केशवास्तानितो नाशयामसि !! (अथर्ववेद- 8:6:23)
-जो कच्चा माँस खाते हैं, जो मनुष्यों द्वारा पकाया हुआ माँस खाते हैं, जो गर्भ रूप अंडों का सेवन करते हैं, उन के इस दुष्ट व्यसन का नाश करो !
अघ्न्या यजमानस्य पशून्पाहि (यजुर्वेद-1:1)
-हे मनुष्यों ! पशु अघ्न्य हैं – कभी न मारने योग्य, पशुओं की रक्षा करो |
अहिंसा परमो धर्मः सर्वप्राणभृतां वरः।
-किसी भी प्राणी को न मारना ही परमधर्म है ।
सुरां मत्स्यान्मधु मांसमासवकृसरौदनम् ।
धूर्तैः प्रवर्तितं ह्येतन्नैतद् वेदेषु कल्पितम् ॥ (शान्तिपर्व- 265:9)
-सुरा, मछली, मद्य, मांस, आसव, कृसरा आदि भोजन, धूर्त प्रवर्तित है जिन्होनें ऐसे अखाद्य को वेदों में कल्पित कर दिया है।
अनुमंता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।
संस्कर्त्ता चोपहर्त्ता च खादकश्चेति घातका: ॥ (मनुस्मृति- 5:51)
प्राणी के मांस के लिए वध की अनुमति देने वाला , सहमति देनेवाला , मारने वाला , मांस का क्रय विक्रय करने वाला ,पकाने वाला ,परोसने वाला और खाने वाला सभी घातकी अर्थात हत्यारे हैं
''व्रीहिमत्तं यवमत्तमथो माषमथो तिलम् ।
एष वां भागो निहितो रत्न धेयाय
दन्तौ मा हिंसिष्टं पितरं मातरं च।'' (अथर्व वेद काणु-६,सूक्त१४०,मंत्र-२)
हे चीर फाड़ करने वाले दोनों दांतो ! चावल खाओ जौ खाओ उड़द की दाल और तिल खाओ हे दाँतो! तुम्हारा यह भाग खाने योग्य है । उत्तम फल प्राप्त करने को नियत किया है । हे दांतो पिता या माता को अर्थात् किसी नर या मादा पशु पक्षी को विनाश मत कर ।
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मैं शाकाहारी हिंदू
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