शिव महापुराण के

शिव महापुराण के 


अनुसार अनादि अनन्त परमेश्वर शिवजी ने एक बार एक से अनेक होना चाहा, तब उन्होंने अपनी दाहिनी भुजा से बांहिनी भुजा का मंथन किया तो जगदम्बा स्वरूप का प्राकट्य हुआ तथा बांहिनी भुजा से दाहिनी भुजा का मंथन किया तो भगवान नारायण का प्राकट्य हुआ।
उसके पश्चात सृष्टि के निर्माण की प्रक्रिया के लिए योगनिद्रा में लीन भगवान नारायण की नाभि में से कमल निकला जिससे भगवान ब्रह्मा जी का प्राकट्य हुआ, और ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण किया।
विष्णु जी सृष्टि के पालनकर्ता हैं तथा शिव जी संहारकर्ता हैं।
अंततः ब्रह्माजी, विष्णुजी व महेशजी तीनों ही त्रिदेव एक ही स्वरूप हैं एक दूसरे से भिन्न नहीं हैं।

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