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🙎राजस्थान की बूड्डी डोकरी 🙎

एक बार एक मुकदमे में डोकरी गवाह बना दी गई।

डोकरी कोर्ट में जा कर खड़ी हो गई,

दोनो वकील भी डोकरी के गाँव के ही थे !

पहला वकील बोला= " डोकरी तू मन्ने जाणे हैं के ?

डोकरी बोली= हाँ भाई तू रामफूल्या का छोरा है ना,

तेरो बापु घणो सूधो आदमी हो बापङो ।

 पण तू निकम्मो एक नम्बर को झूठो।

झूठ, बोल बोल कर के तूं लोगां ने ठगै हैं हरामी

" झूठा गवाह " बणा बणा   कर  तू किया झूठ न साच ओर साच न झूठ बणार जीते  हैं कुत्ता

थार से तो सगला लोग परेशान है, रे हरामी

तेरली लुगाई भी परेशान हो कर के तन्ने छोड़ कर भाग गी।

वकील बेचारा चुप हो कर के देखने लगा ।

उसने सोचा मेरी तो घणी बेइज्जती हो गई अब तू दुसरे की और करा,

उस वकील ने थोडी देर में
दूसरे वकील की तरफ इशारा कर के,

पुछा="डोकरी"तू इने जाणे हैं के?

डोकरी बोली=" हाँ "

ओ छगन्या को छोरो हैं ।

 इको बापू निरा रूप्या खर्च करके इने पढ़ायो पण ओ कमीण कि कोन सिख्यो

सारी उमर छोरियां के पीछै हांडतो फिरतो रेतो हो ।

इको चक्कर थारली लुगाई उ  भी हो !

(कोर्ट में बैठी जनता हंसण लाग गी )

जज बोला :- "आर्डर आर्ड…
जिसने भी लिखा है दिल छु लिया
बहुत ही अच्छी बात कही है किसीने


😞   “ मैंने दहेज़ नहीं माँगा ” 😞

साहब मैं थाने नहीं आउंगा,

अपने इस घर से कहीं नहीं जाउंगा,

माना पत्नी से थोडा मन मुटाव था,

सोच में अन्तर और विचारों में खिंचाव था,

पर यकीन मानिए साहब ,
       “ मैंने दहेज़ नहीं माँगा ”

मानता हूँ कानून आज पत्नी के पास है,

महिलाओं का समाज में हो रहा विकास है।

चाहत मेरी भी बस ये थी कि माँ बाप का सम्मान हो,

उन्हें भी समझे माता पिता, न कभी उनका अपमान हो।

पर अब क्या फायदा, जब टूट ही गया हर रिश्ते का धागा,

यकीन मानिए साहब,
         “ मैंने दहेज़ नहीं माँगा ”


परिवार के साथ रहना इसे पसंन्द नहीं,

कहती यहाँ कोई रस, कोई आनन्द नही,

मुझे ले चलो इस घर से दूर, किसी किराए के आशियाने में,

कुछ नहीं रखा माँ बाप पर प्यार बरसाने में,

हाँ छोड़ दो, छोड़ दो इस माँ बाप के प्यार को,

नहीं मांने तो याद रखोगे मेरी मार को,

बस बूढ़े माता पिता का ही मोह, न छोड़ पाया मैं अभागा,

  यकींन मानिए साहब,
         “ मैंने दहेज़ नहीं माँगा ”

फिर शुरू हुआ वाद विवाद माँ बाप से अलग होने का,

शायद समय आ गया था, चैन और सुकून खोने का,

एक दिन साफ़ …